बस्ती में गैस के लिए 'जंग': सिलेंडर की खातिर फुटपाथ पर रात गुजारने को मजबूर उपभोक्ता, मच्छरदानी लगाकर सड़क पर सो रही जनता

 



बस्ती। उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति किस कदर बदहाल हो चुकी है, इसकी एक रोंगटे खड़े कर देने वाली तस्वीर कोतवाली थाना क्षेत्र के स्टेशन रोड से सामने आई है। यहाँ 'रत्नाकर गैस एजेंसी' के बाहर का नजारा देखकर किसी को भी अपनी आँखों पर यकीन नहीं होगा। गैस सिलेंडर पाने की जद्दोजहद में लोग अब अपना घर-बार छोड़कर सड़कों पर रात बिताने को मजबूर हैं। हालात इतने बदतर हैं कि उपभोक्ताओं को गैस एजेंसी के बाहर फुटपाथ पर मच्छरदानी लगाकर सोना पड़ रहा है, ताकि सुबह होते ही उन्हें समय से सिलेंडर मिल सके।

​आधी रात से ही शुरू हो रहा 'नंबर' का खेल

​बस्ती शहर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में पिछले कई दिनों से रसोई गैस की आपूर्ति पूरी तरह चरमरा गई है। उपभोक्ताओं का आरोप है कि दिन के उजाले में तो सिलेंडर मिलना नामुमकिन हो गया है। इसीलिए, लोग अब रात के अंधेरे में ही गैस एजेंसी पर डेरा डाल रहे हैं। रात करीब 10 बजे से ही लोग अपनी साइकिल, खाली सिलेंडर और मच्छरदानी लेकर स्टेशन रोड स्थित रत्नाकर गैस एजेंसी के बाहर पहुँचने लगते हैं।

​वहाँ मौजूद एक उपभोक्ता ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया, "अगर हम सुबह 6 बजे भी आते हैं, तो पता चलता है कि लाइन 1 किलोमीटर लंबी हो चुकी है और 9 बजते-बजते एजेंसी का शटर गिर जाता है कि स्टॉक खत्म हो गया। इसलिए अब हम रात 11 बजे ही यहाँ आ जाते हैं और मच्छरदानी लगाकर सड़क किनारे ही सो जाते हैं ताकि सुबह हमारा नंबर पहला हो।"

​मच्छरदानी और सड़क: सिस्टम पर बड़ा तमाचा

​सड़क किनारे लगी लाइन में केवल सिलेंडर ही नहीं, बल्कि इंसानी बेबसी भी कतार में खड़ी नजर आती है। मच्छरों के प्रकोप और बीमारियों के डर से लोग अपने साथ मच्छरदानी लेकर आ रहे हैं। बिजली के खंभों या सड़क किनारे लगे पेड़ों के सहारे मच्छरदानी बांधकर लोग जमीन पर ही सो रहे हैं। यह तस्वीर आधुनिक और डिजिटल होते भारत के उस दावे पर एक बड़ा तमाचा है, जहाँ उज्ज्वला योजना के माध्यम से हर घर गैस पहुँचाने की बात कही जाती है। यहाँ गैस तो पहुँच रही है, लेकिन उसे पाने के लिए आम आदमी को अपनी गरिमा और स्वास्थ्य को दांव पर लगाना पड़ रहा है।

​महिलाओं और बुजुर्गों की बढ़ी मुश्किलें

​इस अव्यवस्था की सबसे बड़ी मार महिलाओं और बुजुर्गों पर पड़ रही है। कई महिलाएं अपने छोटे बच्चों को घर पर छोड़कर या साथ लेकर लाइन में लगने को मजबूर हैं। बुजुर्गों को घंटों खड़े रहना पड़ता है और अंत में जब उन्हें यह कहा जाता है कि "सिलेंडर खत्म हो गया", तो उनके चेहरे पर छाई निराशा शासन-प्रशासन की संवेदनहीनता को उजागर करती है। उपभोक्ताओं का कहना है कि गैस बुकिंग के हफ्तों बाद भी उन्हें रिफिल नहीं मिल रहा है, और जब एजेंसी पर सिलेंडर आता है, तो उसकी सूचना पारदर्शी तरीके से नहीं दी जाती।

​कालाबाजारी और भ्रष्टाचार की आशंका

​स्थानीय लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों का आरोप है कि इस किल्लत के पीछे कृत्रिम अभाव (Artificial Scarcity) पैदा किया जा रहा है। उपभोक्ताओं में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि आम जनता तो सड़कों पर सो रही है, लेकिन वहीं दूसरी ओर होटलों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को बैकडोर से गैस सिलेंडर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। लोगों का सवाल है कि यदि आपूर्ति पीछे से कम है, तो फिर ब्लैक मार्केट में सिलेंडर ऊंचे दामों पर कैसे उपलब्ध हैं?

​प्रशासन की चुप्पी और जनता का आक्रोश

​इस पूरी अव्यवस्था पर फिलहाल स्थानीय प्रशासन या जिला पूर्ति विभाग की ओर से कोई ठोस कार्रवाई देखने को नहीं मिली है। उपभोक्ताओं का कहना है कि उन्होंने कई बार इसकी शिकायत संबंधित अधिकारियों से की, लेकिन आश्वासन के अलावा कुछ हासिल नहीं हुआ। रत्नाकर गैस एजेंसी के बाहर रात बिता रहे लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही गैस की आपूर्ति सामान्य नहीं हुई और पारदर्शी वितरण प्रणाली लागू नहीं की गई, तो वे सड़क जाम कर प्रदर्शन करने को विवश होंगे।

​बुनियादी सवाल: जिम्मेदार कौन?

​इस खबर ने बस्ती के प्रशासनिक अमले की कार्यशैली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:

  1. ​आखिर क्यों जनता को एक सिलेंडर के लिए सड़क पर रात गुजारनी पड़ रही है?
  2. ​क्या जिला पूर्ति अधिकारी (DSO) को इस स्थिति की जानकारी नहीं है?
  3. ​गैस एजेंसियों के स्टॉक की नियमित जांच क्यों नहीं की जा रही?
  4. ​उज्ज्वला योजना के इस दौर में उपभोक्ताओं को इस तरह की प्रताड़ना क्यों झेलनी पड़ रही है?

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