मृत्युंजय शर्मा, अम्बेडकरनगर बस्ती मंडल न्यूज़
अम्बेडकरनगर: जनपद की जलालपुर विधानसभा सीट भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए पिछले तीन दशकों से एक अभेद्य किला बनी हुई है। ताज्जुब की बात यह है कि प्रदेश और देश में चली बड़ी-बड़ी लहरें भी इस सीट पर कमल खिलाने में नाकाम रही हैं। यहां की राजनीति पार्टी की लहर के बजाय स्थानीय रणनीति और पेचीदा सामाजिक समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती है, जो भाजपा के लिए हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है।
तीन दशकों का इंतजार: शेर बहादुर सिंह के बाद खाली हैं हाथ
भाजपा ने जलालपुर की धरती पर अपनी आखिरी बड़ी जीत साल 1996 में दर्ज की थी, जब शेर बहादुर सिंह ने पार्टी का परचम लहराया था। उस ऐतिहासिक जीत के बाद से आज तक भाजपा यहां दोबारा मुख्य धारा में नहीं लौट सकी है। हर चुनाव में पार्टी समीकरणों और स्थानीय गुटबाजी के चलते पिछड़ती रही है, जिसका सीधा फायदा विपक्षी दलों को मिलता रहा है।
जातीय और सामाजिक समीकरण बिगाड़ते हैं खेल
जलालपुर की राजनीति केवल विकास या पार्टी की नीतियों पर नहीं, बल्कि गहरे जातीय संतुलन पर टिकी है। यहां दलित, पिछड़ा और मुस्लिम वोट बैंक का गठबंधन समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के लिए 'विनिंग फॉर्मूला' साबित होता रहा है। भाजपा की तमाम कोशिशें इस मजबूत सामाजिक घेराबंदी को तोड़ने में अब तक विफल रही हैं।
मोदी-योगी लहर में भी नहीं खुला खाता
हैरानी की बात यह है कि साल 2014 की प्रचंड मोदी लहर और 2017 व 2022 के विधानसभा चुनावों में प्रदेश भर में भाजपा की आंधी के बावजूद, जलालपुर की सीट पार्टी की झोली में नहीं आ सकी। यह साफ संकेत है कि इस विधानसभा क्षेत्र के मतदाता बाहरी लहर के बजाय स्थानीय कारकों और चेहरों को अधिक प्राथमिकता देते हैं।
गुटबाजी और 'बाहरी' नेताओं की दावेदारी बनी बाधा
पार्टी के भीतर छिपी गुटबाजी और संगठनात्मक कमजोरी भी हार का एक प्रमुख कारण मानी जाती है। चुनाव नजदीक आते ही होर्डिंग और बैनर के जरिए कई दावेदार सामने आते हैं, लेकिन स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल की कमी पार्टी की ताकत को कमजोर कर देती है। इसके अलावा, अन्य विधानसभा क्षेत्रों के नेताओं की यहां दावेदारी भी स्थानीय कैडर में असंतोष पैदा करती रही है।
2027 की राह अभी भी काँटों भरी
वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए स्पष्ट है कि भाजपा के लिए जलालपुर का रण अभी भी आसान नहीं है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि पार्टी ने 2027 के चुनाव से पहले अपनी रणनीति में बुनियादी बदलाव नहीं किया, तो परिणाम फिर से निराशाजनक हो सकते हैं। इस सीट पर फतह के लिए केवल हवा नहीं, बल्कि जमीन पर मजबूत पकड़, सटीक सामाजिक संतुलन और एक सर्वमान्य स्थानीय चेहरे की दरकार है।

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