अंबेडकरनगर, भीटी | 21 फरवरी, 2026
भूमिका: तहसील परिसर में सिसकती न्याय की उम्मीद
आज सुबह जब भीटी तहसील परिसर में सूरज की पहली किरण पड़ी, तो कार्यालय खुलने से पहले ही वहां दर्जनों बुजुर्ग किसान अपनी फाइलों को सीने से चिपकाए बैठे मिले। यह दृश्य किसी उत्सव का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की नाकामी का है जिसे 'राजस्व का गढ़' कहा जाता है। भीटी तहसील में इस समय सबसे बड़ा और ज्वलंत मुद्दा 'जमीनी पैमाइश, वरासत में हेराफेरी और लेखपालों की मनमानी' बन चुका है। यह मामला अब केवल प्रशासनिक नहीं रहा, बल्कि एक बड़े सामाजिक संघर्ष का रूप ले चुका है।
1. मामले की जड़: वरासत और पैमाइश का 'रेट कार्ड'
भीटी तहसील के गांवों, जैसे खजुआ, मिझौड़ा और कटेहरी से सटे इलाकों से लगातार शिकायतें आ रही हैं कि यहाँ 'लाल बस्ते' (लेखपालों का बस्ता) के बिना मेड़ की मिट्टी भी नहीं सरकती। आज सुबह की हमारी पड़ताल में सामने आया कि सामान्य वरासत, जो कि मृतक के वारिसों का कानूनी हक है और जिसे ऑनलाइन प्रक्रिया से सरल होना चाहिए था, उसे महीनों तक लटकाया जा रहा है।
- भ्रष्टाचार का तंत्र: स्थानीय बिचौलियों और तहसील के कुछ बाबुओं के बीच एक ऐसा गठजोड़ बन गया है जो गरीब किसान को 'तारीख पर तारीख' देने पर मजबूर करता है। एक किसान ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि "साहब, लेखपाल साहब बिना 'सुविधा शुल्क' के खेत तक कदम नहीं रखते।"
2. ताजा विवाद: पैमाइश के दौरान खूनी संघर्ष की आहट
आज सुबह भीटी के एक गांव में पैमाइश के दौरान दो पक्षों में जमकर कहासुनी हुई। पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा क्योंकि राजस्व टीम ने कथित तौर पर एक पक्ष को फायदा पहुँचाने के लिए मेड़ को गलत तरीके से चिन्हित किया था।
- मुद्दा: जब तकनीक (GPS और डिजिटल पैमाइश) का जमाना है, तब भी भीटी में पुरानी 'जरीब' और 'नक्शे' के नाम पर धांधली हो रही है। पुराने नक्शे फट चुके हैं या उनमें जानबूझकर कांट-छांट की गई है, जिससे दो सगे भाइयों के बीच भी दुश्मनी की दीवार खड़ी हो रही है।
3. चकबंदी और सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे
भीटी तहसील का एक और बड़ा मामला 'ग्राम समाज की भूमि और चकमार्गों पर अवैध कब्जा' है। आज सुबह जब हमारी टीम भीटी के भीतरी इलाकों में पहुँची, तो पाया कि कई गांवों के मुख्य रास्ते रसूखदारों ने जोत लिए हैं।
- प्रशासन की चुप्पी: ताज्जुब की बात यह है कि एंटी-भूमाफिया सेल की बैठकों के बावजूद धरातल पर कोई बड़ी कार्रवाई नहीं दिख रही है। चकमार्गों के बंद होने से किसानों को अपने ट्रैक्टर और हल खेतों तक ले जाने में भारी मशक्कत करनी पड़ रही है, जिससे अक्सर विवाद होते हैं।
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