सिद्धार्थनगर। 21 फरवरी, 2026 की सुबह इटवा तहसील के ककरहवा और मसिना क्षेत्र के ग्रामीण एक बार फिर राप्ती नदी के किनारे इकट्ठा हैं। मुद्दा पुराना है लेकिन घाव हर साल हरा हो जाता है— 'नदी का कटान और बाढ़ सुरक्षा'।
मुद्दे की गहराई:
इटवा तहसील का एक बड़ा हिस्सा राप्ती और बूढ़ी राप्ती के जाल में फंसा है। फरवरी का महीना तकनीकी रूप से 'वर्किंग सीजन' होता है, जिसमें बाढ़ आने से पहले तटबंधों (बँधों) को ऊंचा और मजबूत किया जाना चाहिए। लेकिन आज सुबह की जमीनी हकीकत यह है कि बजट की कमी या प्रशासनिक सुस्ती के कारण कई संवेदनशील पॉइंट्स पर पत्थर के बोल्डर (Geo-bags) डालने का काम अभी शुरू भी नहीं हुआ है।
ग्रामीणों की पीड़ा:
स्थानीय किसान मोहम्मद असलम बताते हैं, "साहब, जब जून-जुलाई में पानी सिर के ऊपर आ जाता है, तब सरकारी मशीनरी जागती है। आज धूप है, मिट्टी सूखी है, काम अभी होना चाहिए।" पिछली बाढ़ में इटवा के दर्जनों गांवों की फसलें बर्बाद हो गई थीं और सैकड़ों एकड़ उपजाऊ भूमि नदी में समाहित हो गई थी।
बस्ती मंडल न्यूज़ का नजरिया:
प्रशासन को 'दो कदम आगे' बढ़ते हुए केवल आपदा प्रबंधन नहीं, बल्कि 'आपदा रोकथाम' पर ध्यान देना होगा। अगर फरवरी-मार्च में इन तटबंधों की ड्रेसिंग और मजबूती नहीं हुई, तो इस साल भी इटवा के किसानों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
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