विस्तृत रिपोर्ट:
सिद्धार्थनगर की सबसे पुरानी और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध तहसील बांसी आज अपनी बुनियादी नागरिक सुविधाओं के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। बांसी नगर पालिका क्षेत्र के भीतर सीवरेज और जल निकासी की व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। आज की प्रमुख खबर यह है कि नगर का सारा गंदा पानी और कचरा बिना किसी शोधन (Treatment) के सीधे राप्ती नदी में गिराया जा रहा है। शाम के समय जब नदी के तटों पर लोग टहलने निकलते हैं, तो वहां की दुर्गंध और गंदगी प्रशासन के 'स्वच्छ भारत' के दावों की पोल खोलती है।
अधूरी योजनाएं और बजट की बर्बादी:
बांसी तहसील में करीब पांच साल पहले एक आधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) का प्रस्ताव पास हुआ था, लेकिन आज तक उसका निर्माण कार्य पूरा नहीं हो पाया। पाइपलाइन बिछाने के नाम पर नगर की अधिकांश सड़कें खोद दी गईं और उन्हें वैसे ही छोड़ दिया गया। आज शाम हुई स्थानीय सभा में नागरिकों ने आक्रोश व्यक्त किया कि खोदी गई सड़कों के कारण आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं। शाम ढलते ही नालियों का गंदा पानी ओवरफ्लो होकर मुख्य मार्गों पर जमा हो जाता है, जिससे पैदल चलना भी दूभर है।
स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रहार:
राप्ती नदी, जिसे बांसी की पहचान माना जाता है, अब एक मृतप्राय जलधारा में बदल रही है। जलीय जीव मर रहे हैं और किनारे के हैंडपंपों का पानी भी अब दूषित (Contaminated) होने लगा है। डॉक्टरों का कहना है कि बांसी में चर्म रोग और पेट की बीमारियों के मरीजों में 40% की वृद्धि हुई है। तहसील प्रशासन और नगर पालिका एक-दूसरे पर जिम्मेदारी थोप रहे हैं। बांसी की जनता का यह मुद्दा अब केवल स्थानीय नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़े जन आंदोलन का रूप ले रहा है। यदि जल्द ही सीवरेज प्रोजेक्ट को चालू नहीं किया गया, तो बांसी की ऐतिहासिक विरासत गंदगी के ढेर में दब जाएगी।
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