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ज़हरीली' हुई राप्ती! शोहरतगढ़ के 15 गांवों में फैला डायरिया का प्रकोप; प्रशासन में मचा हड़कंप


​सिद्धार्थनगर। उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिले सिद्धार्थनगर के शोहरतगढ़ और लोटन ब्लॉक के इलाकों में आज (24 फरवरी) सुबह से ही चीख-पुकार मची हुई है। राप्ती नदी के तराई वाले करीब 15 गांवों में अचानक डायरिया (उल्टी-दस्त) और जलजनित बीमारियों का भीषण प्रकोप फैल गया है। अब तक मिली जानकारी के अनुसार, एक ही दिन में 60 से अधिक लोग बीमार होकर स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) और निजी अस्पतालों में भर्ती कराए गए हैं, जिनमें बच्चों और बुजुर्गों की संख्या सबसे अधिक है।
​यह घटना केवल एक स्वास्थ्य संकट नहीं है, बल्कि यह जिले के जल प्रबंधन और स्वच्छता अभियान के दावों पर एक बड़ा सवालिया निशान है।
​कैसे शुरू हुआ संकट? दूषित जल बना काल
​स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, पिछले दो दिनों से नलों (हैंडपंपों) से आने वाला पानी मटमैला और दुर्गंधयुक्त था। शोहरतगढ़ के ककराही, चिल्हिया और पकड़ी जैसे गांवों में मंगलवार सुबह होते-होते अचानक दर्जनों लोगों की तबीयत बिगड़ने लगी। देखते ही देखते हर घर में एक-दो मरीज बिस्तर पर पड़ गए।
​ग्रामीणों का आरोप है कि राप्ती नदी के जलस्तर में मामूली बदलाव और भूजल के दूषित होने की शिकायत उन्होंने पहले भी की थी, लेकिन जल निगम या ग्राम पंचायत स्तर पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। आज स्थिति यह है कि गांव-गांव में एम्बुलेंस के सायरन गूंज रहे हैं।
​अस्पतालों की हालत: बेड कम, मरीज ज़्यादा
​शोहरतगढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) में आज दोपहर तक पैर रखने की जगह नहीं बची थी।
बेड की किल्लत: मरीजों की संख्या इतनी अधिक हो गई कि एक-एक बेड पर दो-दो बच्चों का इलाज करना पड़ रहा है। कई मरीजों को गैलरी में स्ट्रेचर पर लिटाकर ड्रिप चढ़ाई जा रही है।
​दवाओं का अभाव: तीमारदारों का आरोप है कि अस्पताल में ओआरएस (ORS) के पैकेट और जरूरी एंटीबायोटिक्स की कमी है, जिसके कारण उन्हें बाहर की दुकानों से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं।
​रेफरल का सिलसिला: स्थिति बिगड़ने पर गंभीर रूप से बीमार 8 बच्चों को जिला अस्पताल (माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज) रेफर कर दिया गया है।
​प्रशासनिक अमला सक्रिय: सीएमओ (CMO) ने संभाली कमान
​घटना की सूचना मिलते ही सिद्धार्थनगर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) अपनी टीम के साथ प्रभावित गांवों में पहुंचे। स्वास्थ्य विभाग ने आनन-फानन में 'मेडिकल कैंप' लगाए हैं।
​क्लोरीन की गोलियां: स्वास्थ्य टीमों द्वारा घर-घर जाकर क्लोरीन की गोलियां बांटी जा रही हैं और लोगों को पानी उबालकर पीने की सलाह दी जा रही है।
​सैंपलिंग: जल निगम की टीम ने प्रभावित गांवों के 25 हैंडपंपों के पानी के नमूने लिए हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या पानी में आर्सेनिक या किसी विशेष बैक्टीरिया की मात्रा बढ़ी है।
​क्या कहते हैं जिम्मेदार?
​सिद्धार्थनगर के जिलाधिकारी (DM) ने इस मामले में कड़ी नाराजगी जताई है। उन्होंने खंड विकास अधिकारी (BDO) और जल निगम के अधिशासी अभियंता से रिपोर्ट तलब की है। डीएम ने स्पष्ट कहा है कि "अगर यह पाया गया कि नालियों की सफाई न होने या दूषित पेयजल की आपूर्ति में लापरवाही बरती गई है, तो संबंधित सचिव और ग्राम प्रधान पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।"
​राजनीतिक गलियारों में हलचल
​चूंकि यह एक बड़ा मानवीय संकट बनता जा रहा है, इसलिए स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी अस्पतालों का रुख किया है। विपक्षी दलों ने सरकार के 'हर घर नल योजना' पर तंज कसते हुए कहा है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी अगर जनता दूषित पानी पीने को मजबूर है, तो यह भ्रष्टाचार का जीता-जागता प्रमाण है।
​न्यूज़ पोर्टल के लिए विशेष रिपोर्टिंग बिंदु:
​ग्राउंड रिपोर्ट: हमारे सूत्रों के अनुसार, कई गांवों में अभी भी स्वास्थ्य टीमें नहीं पहुंची हैं, जहाँ लोग घरेलू उपचार के भरोसे हैं।
​सफाई अभियान की पोल: स्वच्छ भारत मिशन के तहत गांवों में जो नालियां बनाई गई थीं, वे चोक पड़ी हैं, जिससे गंदा पानी पेयजल के स्रोतों में मिल रहा है।
​अगले 24 घंटे भारी: डॉक्टरों का मानना है कि अगर संक्रमण नहीं रुका, तो यह पूरे ब्लॉक में महामारी का रूप ले सकता है।
निष्कर्ष:
सिद्धार्थनगर के शोहरतगढ़ की यह घटना प्रशासन के लिए एक बड़ी चेतावनी है। विकास की बड़ी-बड़ी बातों के बीच बुनियादी जरूरत—'साफ पानी'—आज भी यहां के लोगों के लिए एक विलासिता बनी हुई है। पोर्टल के माध्यम से हम प्रशासन से अपील करते हैं कि युद्धस्तर पर राहत कार्य चलाए जाएं ताकि किसी मासूम की जान न जाए।

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