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अम्बेडकरनगर भाजपा में 'अध्यक्ष' की कुर्सी पर पेंच: गुटबाजी के कारण दिल्ली-लखनऊ की दौड़ तेज, क्या 2027 की राह होगी मुश्किल?


ब्यूरो रिपोर्ट | अम्बेडकरनगर



​अम्बेडकरनगर में भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक चुनावों की सुगबुगाहट तो तेज है, लेकिन जिलाध्यक्ष की कुर्सी को लेकर सस्पेंस कम होने का नाम नहीं ले रहा है। जहां उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में नाम लगभग तय माने जा रहे हैं, वहीं अम्बेडकरनगर में भीतरी खींचतान और गुटबाजी ने प्रदेश नेतृत्व की रातों की नींद उड़ा रखी है। हालत यह है कि दावेदारों की 'लॉबिंग' अब जिले से निकलकर लखनऊ और दिल्ली के गलियारों तक पहुँच गई है।

क्यों फंसा है पेंच?

​सूत्रों की मानें तो जिलाध्यक्ष पद के लिए इस बार दावेदारों की लंबी फेहरिस्त है। पार्टी के भीतर सक्रिय दो से तीन प्रमुख गुट अपने-अपने चहेतों को कुर्सी पर बैठाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं।

  • शक्ति प्रदर्शन: कई दावेदारों ने गुपचुप तरीके से अपना शक्ति प्रदर्शन भी किया है।
  • सहमति का अभाव: आपसी गुटबाजी इतनी प्रभावी है कि किसी एक नाम पर आम सहमति बनाना प्रदेश आलाकमान के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
  • असंतोष का डर: पार्टी नेतृत्व को डर है कि किसी एक गुट को तवज्जो देने से दूसरा गुट बागी तेवर अपना सकता है, जिसका सीधा असर आने वाले चुनावों पर पड़ेगा।

2027 का चुनाव और संगठन की चुनौती

​राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भाजपा हाईकमान मिशन 2027 को ध्यान में रखते हुए एक ऐसे चेहरे की तलाश में है जो सभी गुटों को साथ लेकर चल सके। लेकिन अम्बेडकरनगर का पुराना इतिहास रहा है कि यहाँ संगठनात्मक नियुक्तियों के समय विवाद की स्थिति बनती ही है।

​"जिले में सभी गुटों को संतुलित करना प्राथमिकता है। जल्दबाजी में लिया गया कोई भी फैसला संगठन में बड़ी दरार पैदा कर सकता है, इसलिए गहन मंथन जारी है।"

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता (नाम न छापने की शर्त पर)


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