करोड़ों का खेल: इस गांव में साल 2015-16 में सवा दो करोड़ की लागत से एक टंकी बनी थी, जो भ्रष्टाचार की वजह से लीक होने लगी और उसे ढहा दिया गया।
कागजी जादूगरी: इसके बाद 2019-20 में उसी जगह फिर से लाखों रुपये खर्च कर दूसरी टंकी का निर्माण दिखाया गया। हैरान करने वाली बात यह है कि आज वहां एक भी टंकी खड़ी नहीं है।
बोर्ड बनाम हकीकत: गांव में सिर्फ विभाग का 'बोर्ड' लगा है, लेकिन टंकी गायब है। अधिकारी योगेंद्र प्रसाद से जब इस पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने "आज नहीं, कल बताऊंगा" कहकर पल्ला झाड़ लिया।
0 टिप्पणियाँ